New Delhi: सुप्रीम कोर्ट में संविधान की व्याख्या से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई के लिए स्थायी पांच सदस्यीय संविधान पीठ बनाने का सुझाव सामने आया है। जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) से इस व्यवस्था पर विचार करने का अनुरोध किया है। प्रस्ताव का उद्देश्य संविधान पीठों के गठन में लगने वाले समय को कम करना और लंबे समय से लंबित संवैधानिक मामलों की सुनवाई को अधिक निरंतर बनाना है। सुप्रीम कोर्ट में संविधान की व्याख्या से जुड़े गंभीर कानूनी सवालों पर कम से कम पांच जजों की पीठ सुनवाई करती है। यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 145(3) में निर्धारित है। फिलहाल ऐसी पीठ का गठन जरूरत के अनुसार CJI द्वारा किया जाता है।
क्यों उठी स्थायी संविधान पीठ की जरूरत?
मौजूदा व्यवस्था में अलग-अलग मामलों के लिए संविधान पीठ का गठन करना पड़ता है। वहीं सुप्रीम कोर्ट के जज नियमित रोस्टर के तहत दूसरे मामलों की सुनवाई भी करते हैं। ऐसे में संवैधानिक मामलों के लिए पीठ का गठन और उसकी उपलब्धता कई बार सुनवाई की निरंतरता को प्रभावित कर सकती है। जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ के सुझाव का मुख्य उद्देश्य इसी प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित करना है। प्रस्ताव के मुताबिक, यदि पांच जजों की एक स्थायी संविधान पीठ उपलब्ध रहती है तो महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों की सुनवाई नियमित रूप से की जा सकती है।
22 मुख्य मामले और 175 संबंधित मामले लंबित
सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों वाली संविधान पीठ के स्तर के 22 मुख्य मामले और उनसे जुड़े करीब 175 टैग्ड मामले लंबित बताए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट की लंबित मामलों पर उपलब्ध विश्लेषणात्मक आंकड़ों में भी जून 2026 के अंत तक 22 पांच-जजों वाली बेंच के मामले और 175 संबंधित मामले दर्ज किए गए थे। इन मामलों में संविधान की व्याख्या से जुड़े ऐसे सवाल शामिल हो सकते हैं जिनका प्रभाव आगे के कई मामलों पर पड़ता है। इसलिए इनकी सुनवाई और निर्णय में निरंतरता महत्वपूर्ण मानी जाती है।
स्थायी संविधान पीठ से क्या बदल सकता है?
यदि ऐसी व्यवस्था लागू होती है तो इसके संभावित प्रशासनिक और न्यायिक प्रभाव कई स्तरों पर देखने को मिल सकते हैं।
- संविधान पीठ के गठन की प्रक्रिया को बार-बार दोहराने की जरूरत कम हो सकती है।
- संवैधानिक मामलों की सुनवाई के लिए अधिक नियमित समय निर्धारित किया जा सकता है।
- लंबे समय से लंबित मामलों की सुनवाई में निरंतरता आ सकती है।
- समान संवैधानिक सवालों पर फैसलों में एकरूपता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
- CJI के रोस्टर प्रबंधन में संवैधानिक मामलों की सूची को व्यवस्थित करना आसान हो सकता है।
हालांकि, स्थायी संविधान पीठ बनाने का सुझाव अभी एक प्रस्ताव के स्तर पर है। इसे लागू करने के लिए न्यायालय के प्रशासनिक स्तर पर निर्णय और आवश्यक व्यवस्था तय करनी होगी।
क्या होता है संविधान पीठ का काम?
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ उन मामलों की सुनवाई करती है जिनमें संविधान की व्याख्या से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न सामने आते हैं। संविधान के अनुच्छेद 145(3) के तहत ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए कम से कम पांच जजों की पीठ आवश्यक होती है।
संविधान पीठ के सामने आने वाले मामलों में कई बार ये विषय शामिल होते हैं—
- मौलिक अधिकारों की व्याख्या
- संसद और कार्यपालिका की संवैधानिक शक्तियां
- केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों का बंटवारा
- शक्तियों के विभाजन से जुड़े सवाल
- संवैधानिक संशोधनों की वैधता
- संविधान के महत्वपूर्ण प्रावधानों की व्याख्या
इन मामलों में दिया गया फैसला आगे आने वाले समान मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण कानूनी आधार बन सकता है।
संवैधानिक मामलों की सुनवाई में निरंतरता पर जोर
स्थायी पांच सदस्यीय संविधान पीठ का विचार मुख्य रूप से सुनवाई की निरंतरता और लंबित मामलों के प्रबंधन से जुड़ा है। एक ही पीठ द्वारा लगातार संवैधानिक मामलों की सुनवाई होने से न्यायाधीशों को संबंधित कानूनी मुद्दों की पृष्ठभूमि और पहले की दलीलों से लगातार जुड़े रहने का अवसर मिल सकता है। हालांकि, यह भी ध्यान रखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट में संविधान पीठों का आकार केवल पांच जजों तक सीमित नहीं है। आवश्यकता के अनुसार बड़ी संविधान पीठों का गठन भी किया जाता है। इसलिए पांच सदस्यीय स्थायी पीठ के साथ बड़े संवैधानिक सवालों के लिए अलग पीठों की जरूरत बनी रह सकती है। फिलहाल यह सुझाव CJI के विचार के लिए रखा गया है। यदि इस पर आगे कोई प्रशासनिक फैसला होता है, तो सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक मामलों की सुनवाई और केस मैनेजमेंट की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव देखने को मिल सकता है।



