Ranchi : कांके प्रखंड के दुबलिया गाँव में इस वर्ष मंडा पूजा समिति द्वारा आयोजित पारंपरिक मंडा पूजा महोत्सव में भव्यता और भक्ति का अद्वितीय संगम देखने को मिला। “जय सरना” और “जय धरती माँ” के गगनभेदी नारों के साथ आरंभ हुआ यह आयोजन ग्रामीण संस्कृति, आस्था और परंपरा का जीवंत उदाहरण बना।
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महोत्सव की शुरुआत पूजा-अर्चना और पारंपरिक गीतों के साथ हुई, जिसमें सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु और ग्रामीणों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। आयोजन स्थल को रंग-बिरंगे पताकाओं, पारंपरिक सजावट और सांस्कृतिक झाँकियों से सजाया गया, जिसने समूचे वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
पारंपरिक ‘मंडा झूला’ बना मुख्य आकर्षण –
कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण ऊँचे स्तंभ पर लटका मंडा झूला रहा, जो परंपरा और साहस का प्रतीक माना जाता है। इस झूले पर बैठे कलाकार की हैरतअंगेज हरकतों ने दर्शकों को रोमांचित कर दिया। मान्यता है कि झूलन के दौरान भोक्ताओं द्वारा फेंके गए पुष्पों से भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त होती है।
सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने मोहा मन-
समिति द्वारा आयोजित सांस्कृतिक मंच पर फूलखुंदी, झूमर, जागरण, कविता पाठ और अन्य पारंपरिक प्रस्तुतियों ने जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। स्थानीय प्रतिभाओं को मंच देने की इस पहल ने युवा पीढ़ी में अपनी सांस्कृतिक जड़ों के प्रति गर्व और जुड़ाव का भाव उत्पन्न किया।
सामुदायिक सहभागिता और योगदान –
इस आयोजन को सफल बनाने में विमल पहान पंडित, लाला पहान, बाहा उराँव, संदीप उरांव, संतोष करमाली, मगन उराँव, अजय उराँव, सुनील उराँव, सुधीर करमाली, बिरसा उराँव, प्रकाश उराँव, विक्की उराँव, छोटू उराँव सहित अन्य कई गणमान्य व्यक्तियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
90 वर्षों की परंपरा का गौरवपूर्ण निर्वाह –
गाँव के समाजसेवी संदीप उराँव ने जानकारी दी कि यह मंडा पूजा परंपरा पिछले 90 वर्षों से अक्षय तृतीया के अवसर पर आयोजित की जा रही है। इस वर्ष 12 दिनों के उपवास और 51 भोक्ताओं एवं 51 सोकताईनों के समर्पण से यह महोत्सव श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक बन गया।
दुबलिया गाँव में आयोजित यह मंडा पूजा महोत्सव न केवल सांस्कृतिक विरासत का संवाहक बना, बल्कि सामूहिक सहभागिता, सामाजिक सौहार्द और परंपरा के पुनरुद्धार का प्रेरणादायक उदाहरण भी प्रस्तुत किया।

