पटना: बिहार में महिला सशक्तिकरण की तस्वीर अब सिर्फ योजनाओं और आंकड़ों तक सीमित नहीं है। राज्य के ग्रामीण इलाकों में महिलाएं छोटे-छोटे कारोबार शुरू कर आर्थिक आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश कर रही हैं। जीविका योजना से जुड़ी सारण के जलालपुर की आनंदी देवी की कहानी इसी बदलाव की प्रेरक तस्वीर है। कभी छोटी-सी गुमटी से करीब 2 हजार रुपये की आमदनी करने वाली आनंदी दीदी आज अपने कारोबार से हर महीने 60 हजार से 65 हजार रुपये तक की आय अर्जित कर रही हैं। खास बात यह है कि उनकी सफलता अब सिर्फ उनके परिवार तक सीमित नहीं है। बढ़ते कारोबार के साथ उन्होंने 10 से 12 अन्य जीविका दीदियों को भी रोजगार से जोड़ा है।
2017 में जीविका से जुड़कर बदली कारोबार की दिशा
आनंदी देवी ने अपने सफर की शुरुआत एक छोटी किराना दुकान से की थी। सीमित पूंजी और छोटे स्तर के कारोबार के कारण आमदनी भी काफी कम थी। वर्ष 2017 में उन्होंने जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ने का फैसला किया। जीविका से जुड़ने के बाद उन्हें कारोबार बढ़ाने, ऋण प्राप्त करने और नए उत्पादों के जरिए आय बढ़ाने के अवसरों की जानकारी मिली। इसी के तहत स्वयं सहायता समूह से 50 हजार रुपये का ऋण लेकर उन्होंने अपनी दुकान का विस्तार किया। इसके बाद उन्होंने केवल किराना सामान बेचने तक खुद को सीमित नहीं रखा। अचार और भुजा जैसे घरेलू खाद्य उत्पादों को कारोबार का हिस्सा बनाया। धीरे-धीरे उनके हाथों के स्वाद ने ग्राहकों के बीच अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी।
अचार से सत्तू तक, बढ़ता गया कारोबार
आज आनंदी देवी कई तरह के खाद्य उत्पाद तैयार कर उनकी बिक्री करती हैं। उनके कारोबार में स्थानीय स्वाद और घरेलू उत्पादों की बड़ी भूमिका है। उनके उत्पादों की मांग अब सारण के बाजार से निकलकर उत्तर प्रदेश के बलिया और देवरिया तक पहुंच चुकी है। कारोबार के विस्तार का असर उनकी मासिक आमदनी पर भी दिखा है।
मेलों ने खोला बड़े बाजार का रास्ता
आनंदी देवी के कारोबार को आगे बढ़ाने में मेलों की भी अहम भूमिका रही है। पटना सरस मेला और सोनपुर मेला उनके उत्पादों के लिए बड़े बाजार साबित हुए। इन मेलों में उन्हें सीधे नए ग्राहकों तक पहुंचने और अपने उत्पादों की पहचान बनाने का मौका मिला। आनंदी देवी के मुताबिक, इन आयोजनों में बिक्री के जरिए वह करीब 3 लाख से 3.50 लाख रुपये तक का कारोबार कर लेती हैं। मेलों के माध्यम से उन्हें न सिर्फ नए ग्राहक मिले, बल्कि उत्पादों की पहुंच भी पहले के मुकाबले काफी बढ़ी।
अब दूसरी महिलाओं को भी दे रहीं रोजगार
कारोबार बढ़ने के साथ काम का दायरा भी बढ़ा। अकेले उत्पादन और बिक्री संभालना मुश्किल होने लगा तो आनंदी देवी ने दूसरी महिलाओं को भी अपने काम से जोड़ना शुरू किया। आज करीब 10 से 12 जीविका दीदियां उनके कारोबार में काम कर रही हैं। इस तरह आनंदी देवी की सफलता ने कई दूसरे परिवारों के लिए भी आय का रास्ता तैयार किया है।
महिला आत्मनिर्भरता की बनी मिसाल
आनंदी देवी की कहानी यह दिखाती है कि ग्रामीण महिलाओं को यदि वित्तीय मदद, प्रशिक्षण और बाजार से जुड़ने का अवसर मिले तो वे छोटे कारोबार को भी बड़े उद्यम में बदल सकती हैं। एक छोटी-सी गुमटी से शुरू हुआ सफर आज उन्हें सफल उद्यमी बनाने के साथ-साथ दूसरी महिलाओं के लिए रोजगार का जरिया भी बन चुका है। जीविका दीदी आनंदी देवी की यह सफलता बिहार में ग्रामीण महिला उद्यमिता और आत्मनिर्भरता की बदलती तस्वीर को सामने लाती है।


