पटना: बिहार के ग्रामीण इलाकों में शिक्षा और डिजिटल साक्षरता की तस्वीर तेजी से बदल रही है। जीविका योजना के तहत संचालित जीविका-दीदी की लाइब्रेरी (सामुदायिक पुस्तकालय सह करियर विकास केंद्र) गांवों के युवाओं और महिलाओं के लिए पढ़ाई, डिजिटल ज्ञान और रोजगार की दिशा में आगे बढ़ने का नया मंच बन गई है। राज्य में फिलहाल 118 केंद्र संचालित हो रहे हैं, जिनसे अब तक एक लाख से अधिक किशोर और युवा जुड़ चुके हैं।
इन पुस्तकालयों की खास बात यह है कि यहां केवल किताबों से पढ़ाई नहीं होती, बल्कि विद्यार्थियों को डिजिटल संसाधन, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, ऑनलाइन आवेदन और करियर संबंधी मार्गदर्शन भी मिलता है। वहीं, इन केंद्रों के संचालन की जिम्मेदारी संभाल रही विद्या-दीदियां ग्रामीण महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने की मिसाल पेश कर रही हैं।
118 लाइब्रेरी में रोज पहुंच रहे हजारों शिक्षार्थी
ग्रामीण विकास विभाग के अनुसार, राज्य में संकुल स्तरीय संघ (सीएलएफ) के माध्यम से 118 जीविका-दीदी की लाइब्रेरी संचालित की जा रही हैं। ये केंद्र सप्ताह के सातों दिन सुबह 9:30 बजे से शाम 5 बजे तक खुले रहते हैं। हर पुस्तकालय में प्रतिदिन औसतन 50 से 70 शिक्षार्थी पहुंचते हैं। इस तरह राज्यभर में रोज करीब 5 हजार से 7 हजार बच्चे और युवा इन केंद्रों में अध्ययन करते हैं। इनमें लड़कियों की भागीदारी उल्लेखनीय है। कुल शिक्षार्थियों में करीब 61 फीसदी लड़कियां हैं।
पढ़ाई छोड़ चुके युवाओं को भी मिल रहा दूसरा मौका
इन सामुदायिक पुस्तकालयों का उद्देश्य केवल नियमित विद्यार्थियों को पढ़ने की जगह उपलब्ध कराना नहीं है। ऐसे युवा भी यहां पहुंच रहे हैं, जिन्होंने किसी कारण से बीच में पढ़ाई छोड़ दी थी। ऐसे विद्यार्थियों को दोबारा शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए एनआईओएस, बीबीओएसई और इग्नू जैसे संस्थानों में नामांकन कराने में मदद की जा रही है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों के उन युवाओं के लिए आगे की पढ़ाई का रास्ता खुल रहा है, जो आर्थिक या सामाजिक कारणों से अपनी शिक्षा जारी नहीं रख सके थे।
कंप्यूटर से लेकर हाई-स्पीड इंटरनेट तक की सुविधा
जीविका-दीदी की लाइब्रेरी में विद्यार्थियों को पढ़ाई के लिए आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। यहां शांत अध्ययन वातावरण के साथ कंप्यूटर, टैबलेट, हाई-स्पीड इंटरनेट, किताबें और समाचार पत्र जैसी सुविधाएं मौजूद हैं। इसके अलावा विद्यार्थियों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में मार्गदर्शन दिया जाता है। ऑनलाइन फॉर्म भरने से लेकर करियर विकल्पों को समझने तक में सहायता मिलती है। विशेषज्ञों के माध्यम से करियर काउंसिलिंग और मेंटरिंग की सुविधा भी दी जा रही है।
घर की दहलीज से डिजिटल दुनिया तक पहुंचीं विद्या-दीदियां
जीविका-दीदी की लाइब्रेरी की कहानी केवल विद्यार्थियों की सफलता तक सीमित नहीं है। इन केंद्रों ने ग्रामीण महिलाओं के लिए भी रोजगार और आत्मनिर्भरता के नए अवसर पैदा किए हैं। कभी सामाजिक बंदिशों और संसाधनों की कमी के कारण घर से बाहर निकलने में संकोच करने वाली महिलाएं आज पुस्तकालयों की कमान संभाल रही हैं। प्रत्येक केंद्र पर प्रशिक्षित सामुदायिक पेशेवर के तौर पर विद्या-दीदी यानी डिजिटल एडुप्रेन्योर की भूमिका में महिलाएं काम कर रही हैं। वे पुस्तकालय के रोजमर्रा के संचालन से लेकर विद्यार्थियों को डिजिटल सेवाएं उपलब्ध कराने तक की जिम्मेदारी संभालती हैं। यानी जिन हाथों में कभी घरेलू काम तक सीमित जिम्मेदारियां थीं, वही हाथ आज कंप्यूटर और डिजिटल तकनीक के जरिए ग्रामीण बच्चों के भविष्य को दिशा दे रहे हैं।
नियमित आय के साथ बढ़ा सामाजिक सम्मान
विद्या-दीदी और लाइब्रेरी मैनेजर के तौर पर काम करने वाली महिलाओं को नियमित आय का अवसर मिल रहा है। इससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत होने के साथ-साथ समाज में उनका सम्मान भी बढ़ रहा है। आर्थिक आत्मनिर्भरता ने महिलाओं की भूमिका को परिवार के भीतर भी मजबूत किया है। अब वे केवल घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि शिक्षा, डिजिटल सेवाओं और रोजगार से जुड़े कामों में भी सक्रिय भागीदारी निभा रही हैं।
गांव में ही मिल रहा पढ़ाई और करियर का माहौल
ग्रामीण युवाओं के लिए इन पुस्तकालयों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि प्रतियोगी परीक्षाओं और डिजिटल शिक्षा के लिए अक्सर उन्हें शहरों का रुख करना पड़ता है। जीविका-दीदी की लाइब्रेरी ने इस दूरी को कम किया है। अपने ही गांव या आसपास के क्षेत्र में पढ़ाई का बेहतर माहौल मिलने से विद्यार्थियों को समय और संसाधन दोनों की बचत हो रही है। खासकर छात्राओं के लिए यह सुविधा महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्हें पढ़ाई के लिए दूर जाने की जरूरत कम पड़ती है।
मंत्री ने बताया आत्मसम्मान और सफलता का केंद्र
ग्रामीण विकास विभाग एवं सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के मंत्री श्रवण कुमार ने कहा कि जीविका-दीदी की लाइब्रेरी सिर्फ किताबें पढ़ने की जगह नहीं हैं, बल्कि यह ग्रामीण महिलाओं के आत्मसम्मान और सफलता की कहानी लिख रही हैं। उन्होंने कहा कि राज्य के 118 पुस्तकालयों के जरिए एक लाख से अधिक युवाओं और 61 फीसदी बेटियों तक डिजिटल शिक्षा और करियर मार्गदर्शन पहुंच रहा है। विद्या-दीदियां गांव-गांव में ज्ञान और आत्मनिर्भरता का संदेश पहुंचाने का काम कर रही हैं।
| प्रमुख आंकड़े | जानकारी |
|---|---|
| जीविका-दीदी की लाइब्रेरी | 118 केंद्र संचालित |
| जुड़े किशोर एवं युवा | 1 लाख से अधिक |
| रोजाना पहुंचने वाले शिक्षार्थी | 5,000 से 7,000 |
| लड़कियों की भागीदारी | 61 फीसदी |
| पुस्तकालय संचालन | सप्ताह के सातों दिन |
| डिजिटल सुविधाएं | कंप्यूटर, टैबलेट और हाई-स्पीड इंटरनेट |
| प्रतियोगी परीक्षा सहायता | मार्गदर्शन और करियर काउंसिलिंग |
| पढ़ाई छोड़ चुके युवाओं के लिए पहल | दोबारा शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना |



